हिंदी कविता – बलिदाने – मुहब्बत

“ बलिदाने – मुहब्बत ”

जिंदगी के उस मोड़ पर सपना सुहाना सा देखा था,

उसके सीने में भी धड़कता दिल दीवाना सा देखा था !

मैं रंगा था रंग में उसके और वो ; ……. रंग में मेरे,

उल्फ़त की गलियों में उसी महबूबा को परवाना सा देखा था !!

राज़ न कोई राज़ मगर शाही सा अंदाज़ रहा था,

चलते-चलते पैगामे-उल्फ़त हुज़ूर में उनके कई बार कहा था !

रोक न सका सर्रे राह वो मुझे और मैं उसको,

मगर आँखों ही आँखों में उसने मुझे प्यार कई बार कहा था !!

वो दोस्तों की सलाह कुछ मशवरे जो मुझे भाते थे,

गलियों तक उसके घर की, साथ पूरा जो मेरा निभाते थे !

कदम मगर लड़खड़ाते थे देखकर उसको सामने क्योंकि,

पवित्र प्यार और ममता के दायरे सामने हमेशा मेरे आते थे !!

निभा नहीं सकता था आजीवन मैं, दस्तूर मैंने यही बनाया,

भागता रहा दूर उससे मगर याद में हमेशा दिल अपना जलाया !!

मज़ा इसमें भी मगर इक अलग और निराला था कि,

रख लो पत्थर दिल पे, करतब यही उसको भी नया सिखाया था !!

गलती मेरी थी अगर तो कदम तुम्हारे भी बहके थे,

उल्फ़त के फूल कुछ, दिल की बगिया में तुम्हारे भी महके थे !!

वक्त ने समझी नज़ाकत, आग को दिलों की जरा संभाला,

हकीकत है फ़ल जिसका जुदाई, यही उल्फ़त का हमें वृतांत दिया !!

नादानियाँ शायद जाने अनजाने इन्सान कर जाते हैं,

लांघकर दीवारें कुछ उच्छ्रिन्खलता की बेमौत भी मर जाते हैं !!

कहा कुछ जमाने ने कि तुम तो नहीं वो अल्हड़ और बेवकूफ,

फंसकर वासना के तूफ़ान में जो नाम-उल्फ़त बदनाम कर जाते हैं !!

जाँ नहीं कोई ऐसी जो उल्फ़त का मनोभाव न रखती हो,

या फिर यौवनावस्था में हसीन ख्वाबों का स्वाद न चखती हो !

तूने तो किया है मगर बलिदाने-मुहब्बत ऐ ‘नवोदित’,

अब देख वो नज़र जो इस कर्म को सही मायने में जाँचती हो, परखती हो !!